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Wednesday, 8 March 2023

गीत- एक सजीला फागुन है..

एक सजीला फागुन है और दूजी याद तुम्हारी

दोनों ने मिल कर मारी है, मन पर चोट करारी।


आहत मन को चैन दिलाए,

ढाढ़स कौन बँधाए

रातें लंबी हो जाएँ तो,

कौन संग में गाए ?

विरही गीतों की तानें जब,  ख़ूब चलाए आरी...


अटका रहा पलाश की टहनी,

फागुन द्वार न आया,

पल-पल जिनको याद किया,

उन सबने  मिल बिसराया।

कहाँ गई वे मीठी यादें, वे मधु - ऋतुएँ सारी...


अंगारों-से दहके टेसू,

जब-जब  टेसू-वन में,

तब-तब आग लगाए बिरहा

मेरे प्रेमिल मन में।

करवट लेते जाग-जाग कर  रातें रोज़ गुज़ारी ...


नदी किनारे प्यासा बिरवा,

 कौन भला ये माने?

 बीत रही हो जो ख़ुद पर वह

ख़ुद ही तो बस जाने।

दुख खरीदकर सुख दे ऐसा  मिला नहीं व्यापारी ...



   






Monday, 3 August 2020

सावन पर एक गीत

गीत -
गरज रहे हैं, श्यामल से घन
 फिर से सावन आया

मोर नाचते पंख पसारे
मुग्ध मोरनी तकती,
कूक-कूक वन को गुंजाती,
कोकिल कभी न थकती।
पुलकित है जैसे सारा वन
फिर से सावन आया।

गरज-गरजकर घुमड़ें बादल,
प्रिया हृदय भय भरते
देख तड़ित की कौंध प्रिया के
रह-रह प्राण सिहरते।
और गात में होता कंपन
फिर से सावन आया।

बूँदों की छमछम में जैसे
प्रकृति मगन हो नाचे
मेघों की पाती को धरती
सकुच-सकुच कर बाँचे
धन्य-धरा का सारा जीवन 
फिर से सावन आया।

राग मेघ मल्हार सुनाए
कजरी कोई गाए,
बूँदों की छमछम से प्रेरित
कोई नाच दिखाए।
बना हुआ है आज इंद्र मन
 फिर से सावन आया

खुश हैं कृषक, खेत भी खुश हैं,
खुश है यह जग सारा।
वरदानी इस ऋतु का जग को
सचमुच बड़ा सहारा।
देने जड़-चेतन को जीवन
फिर से सावन आया।
 -  दिनेश गौतम

Wednesday, 8 July 2020

भीग जाने का मौसम

भीग जाने का मौसम

बारिश हो रही है
अनवरत, अबाध।
भीग रही है धरती
भीतर तक
पैठ रहा है पानी।
तृप्त हो रही है धरती
अपनी आँखें मूँदे।

पेड़ों ने झुका दिए हैं सर
बारिश के झकोरों के सामने हथियार डालकर।

घर की खिड़की पर
काँच के इस पार खड़े होकर
बारिश को निहारना
कितना सुखद है!

टूट रही हैं
मन की कठोर परतें,
तुम्हारा ख़याल
मन के भीतर तक पहुँच रहा है।
बारिश और तुम्हारा ख़याल
कितने अभिन्न हैं
एक दूसरे से।
गर्म कॉफी का प्याला
हाथों में लिए मैं
देख रहा हूँ
भिगा रही है बारिश
धरती की देह
और तुम्हारा ख़याल मन को।

हो रहा है सब कुछ
मन के भीतर
भीना-भीना सा।
भीग रहा है मन
भीग जाने का मौसम है यह।
          - दिनेश गौतम
  

Monday, 25 May 2020

उस रात .....



झरे हुए पत्तों में
बिखरा पड़ा है
गुज़रा हुआ वसंत
सिसकता।
नहर किनारे के उस फ़्लैट से
निकलकर
बिखर गया है काला धुआँ
हमारे रिश्तों के आर -पार तक।
कॉलोनी के मकान
सिर झुकाए खड़े हैं।
कभी इन मकानों ने
हमें साथ-साथ देखा था।

याद है मुझे वह सड़क
जो मुड़ जाती थी
गुलमोहर के दाहिने से
तुम्हारे फ़्लैट की ओर।
उस रात बिखरी थी
मटमैली चाँदनी
उस सड़क पर
और
पास के मंदिर से लेकर
तुम्हारे घर तक।

उसी रात मेरे साथ
मंदिर से लेकर
गुलमोहर तक
चहलकदमी करते हुए
तुमने सुनाया था
अपना फ़ैसला ।
जैसे एक-एक लफ्ज़
पढ़ा गया हो
किसी मुकद्दमे के फ़ैसले सा।
मेरे अरमानों की
चिन्दियाँ उड़ रही थीं,
तुम्हारे शब्द-शब्द
मेरे ख़िलाफ़ जा रहे थे।
देर तक
सिर्फ़ और सिर्फ़
सुनता रहा था मैं उन नश्तर-लफ़्ज़ों को।

मुझे पता था
तुम आई थीं
सिर्फ़ स्क्रिप्ट पढ़ने
जैसा कि वह
शामिल हुआ करता है
तुम्हारे काम में।
बहुत सोच-समझकर
तैयार की हुई स्क्रिप्ट-
बहाने, तर्क, मजबूरी, आश्वासन
और न जाने क्या-क्या

और फिर
मेरे लिए वसंत
सिर्फ़ झरे हुए पत्तों
और
सूखी हुई डालियों भर का
नाम होकर रह गया था।

अलगाव के
चरणबद्ध और
सोचे समझे क़दम
उठते रहे
तुम्हारी ओर से,
ईंट-ईंट कर
गिराती रहीं तुम
मेरे ख़्वाबों के महल
जैसे शगल हो यह
तुम्हारा।
अप्रत्याशित था सब कुछ
मेरे लिए
और
पूर्व नियोजित था सब कुछ
तुम्हारे लिए।
मेरे दोनों हाथ
जुड़े रहे
याचना में।

फिर
प्रार्थनाओं के अबोध शिशु
एक -एक कर
मारे तुमने
कुचल-कुचलकर

आख़िर में
संवेदनाओं की लाशें
बिछी हुई थीं
मेरे ठिकाने-
हरे काँच की
उस इमारत से लेकर
नहर किनारे के
तुम्हारे फ़्लैट तक
पूरी सड़क भर।

रौंदती हुई
संवेदनाओं की लाशें,
उनसे मुँह फेरे
निकल गईं तुम
अपने अहंकार की
बग्घी पर सवार ।

रात सिसकती रही,
भावनाएँ
पछाड़ खाकर
गिरती रहीं,
मचा रहा कोहराम
हृदय की बस्ती में ।

आज फिर
उस रात की बरसी है न ?
     
                       - दिनेश गौतम

Monday, 20 April 2020

तुम्हारा नाम

सुनो !
मेरी साँसों में
घुल गया है
नाम तुम्हारा,
मेरी धड़कनों में
चस्पा हैं
तुम्हारे नाम के
एक-एक अक्षर।
हृदय में गूँज रही है
अब भी
तुम्हारी नाम धुन
निरंतर,
अविरल,
अबाध।
हर धड़कन के साथ
और भी स्पष्ट निकलती है
तुम्हारे नाम की ध्वनि

स्मृतियों के जल महल में
रह-रह कर चमकती हैं
तुम्हारी छवियाँ।

तुम्हारा प्रेम
कभी संदेह था
साथ मेरे,
साकार थीं तुम
मेरे साथ
प्रेम के भीतर।
अब
 देह नहीं है तुम्हारी।
मेरे साथ,
देह तो निकलकर चली गई
कहीं और।

मेरे पास बच गया है
केवल प्रेम।
सात्विक,
निर्गुण,
निराकार।
पहले से कहीं उजला,
पहले से कहीं अधिक निर्मल
और बहुत पावन।

सुनो !
यह निराकार बोलता है
मेरे भीतर
सातों सुर में
बोलते हैं अब भी
तुम्हारे नाम के
ढाई अक्षर
मेरी हर धड़कन में।
  दिनेश गौतम

Sunday, 15 March 2020

सूख गया प्रेम वृक्ष

दो हज़ार पंद्रह से मेरा ब्लॉग तकनीकी कारणों से बंद पड़ा था। आज मेरे बेटे प्रणय ने आख़िर वह समस्या हल कर दी और यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि मैंने फिर से उसमें अपनी कविताएँ पोस्ट करना प्रारंभ कर दिया है। शुरुआत एक गीत से - आप सबकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।



सूख गया प्रेम वृक्ष, पत्र सब झरे
सींच रहे ठूँठ को, नयन जल भरे...

जाने क्यों दीपों के भाग लिखे अंधड़ ही
और नए उपवन की, किस्मत में पतझड़ ही
मधुमासी स्वप्न सभी, रह गए धरे.......

लुटी हुई पूँजी है, भोले विश्वासों की
जीवन अब शेष कथा श्वासों -निश्वासों की
कौन यहाँ अमृत की, कामना करे....

नीरवता पसरी है मीलों तक अंतर में,
खिले हुए नागफनी प्राणों के बंजर में
गीतों के निर्झर भी सूख सब मरे.....

नदी के किनारों से, बिगड़े संबंध यहाँ
लहरों की सुने कौन, बहरे तटबंध यहाँ
पत्थर की नौकाएँ, कौन फिर वरे..
              -  दिनेश गौतम

Sunday, 22 February 2015

यादें मरती नहीं हैं----

यादें मरती नहीं हैं

तुम्हारी यादों के साथ- साथ
चलता है झील का किनारा,
जहाँ किनारे खड़े
पेड़ों के साए में
चले थे हम-तुम
साथ-साथ,
झील के दूसरे छोर तक।

तुम्हें याद है या नहीं
तुम्हीं ने आगे बढ़कर
मेरे हाथों में अपना हाथ
डाल दिया था
और कहा था- ‘‘ ये पक्का है,
और इस जनम में तो
छूटने से रहा।’’

बस उसी पल से
हवा में फैल गई थी
तुम्हारे प्यार की खुशबू
और महकाती रही
मेरे मन-प्राणों को
तब से अब तक
और मैंने भी तुम्हें
अपनी रुह में टाँक लिया था।

हैरत में हूँ  मैं
कि झटक दिया है तुमने
अब वही हाथ,
जबकि इसी जनम के
सात बरस भी पूरे नहीं हो पाए।
सतरंगी सपनों का ‘स्पेक्ट्रम’
घुमा दिया  तुमने,
और सब कुछ अचानक
सफेद हो गया।

कोई रंग नहीं जीवन में अब
इस सफेद रंग के सिवा।
हवाओं की खुशबू
कहीं खो गई।
खींच दी तुमने लकीर
अचानक
मेरे और अपने बीच,
और कह दिया-
‘‘इस पार आने से
तुम पत्थर के हो जाओगे।’’
मुझे लगता है कि
तुम ही बदल गईं
किसी पत्थर में
किसी तिलस्म ने
छीन ली मेरी राजकुमारी।

मेरी नींदें
भटकती हैं आँखों से दूर,
यहाँ अब रतजगे रहते हैं
पूछते हैं जो मुझसे-
‘‘क्या हुआ
हाथों में दिए गए हाथ का?
क्या यह जन्म ख़त्म हो चुका है?’’

‘दलपत सागर’ -वह झील,
क्यूँ बदल गई है
पोखर में?
सूख रही है झील,
मर रहा है पानी,
पर
यादें हैं कि मरती नहीं हैं।
             
                     -  दिनेश गौतम


 27. 01.2015                 फतेहसागर झील, उदयपुर।


Monday, 9 September 2013

उनकी क्या है बात

उनकी क्या है बात, वे स्वर्णिम शिखर बनकर रहेंगे,
हम तो हैं बेबस बेचारे, नींव के पत्थर रहेंगे।

उनकी आँखें की चमक हीरों से बढ़ती जाएगी,
और अपने ये नयन तो, अश्रुओं से तर रहेंगे।

तितलियों से बोल दो, इस बाग में न यूँ फिरें,
एक दिन वरना उन्हीं के, कुछ नुचे से पर रहेंगे।

लाख रोकें हम शलभ को दीप की लौ पर न जा,
प्यार पागलपन है ऐसा, वे तो बस जलकर रहेंगे।

नफरतों की वो इमारत अब ढहा दी जाएगी,
इस नगर में तो हमारे, प्यार के ही घर रहेंगे।

देखना तुम जुल्म के आगे झुकी सब गर्दनें,
एक मेरा, इक तुम्हारा दो ही ऊँचे सर रहेंगे।

ये अजब है बात, जिनको चाहिए न हों वहाँ,
वे ही लेकिन उस जगह पर, देखना अक्सर रहेंगे।

खो चुके हैं जो चमक, वे दिख रहे बाज़ार में,
पर असल में हैं जो मोती, सीप के अंदर रहेंगे।
- दिनेश गौतम

Wednesday, 14 November 2012

दीप जलाना होगा...



घना अंधेरा है अब कोई दीप जलाना होगा,
दूर सवेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।

कलह - क्लेश की ज्वाला जलती, दिखती है घर-घर में,
जाग रही शैतानी ताकत लोगों के अंतर में।
तम ने घेरा है अब कोई दीप जलाना होगा...

अंतःद्वंद्वों के बीहड़ में भटक रहा हर मन है,
एक व्यक्ति के कई रूप हैं, दुहरा हर जीवन है।
अजब ये फेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।....

खंडित एक पत्थर रक्खा है, मंदिर के कोने में,
संशय सा होता है अब तो ईश्वर के होने में।
संदेह घनेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।...

अपने कंधे पर हों जैसे अपना ही शव लादे,
लुटे - लुटे से घूम रहे हम पीड़ा के शहजा़दे।
ये वक्त लुटेरा है अब कोइ दीप जलाना होगा।...

सपनों की उजड़ी बस्ती में भटकें हम दीवाने,
ढही हुई है दरो-दीवारें सभी तरफ वीराने।
उजड़ा ये डेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।...

                                                                   - दिनेश गौतम


Thursday, 1 November 2012

छत्तीसगढ़-दर्शन


(आज छत्तीसगढ़ का स्थापना दिवस है।  हरे भरे और हर दृष्टि से संपन्न इस राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं। इसके विभिन्न महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों को लेकर मैंने एक कविता लिखी थी “छत्तीसगढ़ दर्शन” इस कविता को राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने अपनी पत्रिका बालमित्र में पहली बार अक्टूबर 2007 के अंक में प्रकाशित कर 2008 से कक्षा 8वीं की हिंदी भाषा की पाठ्यपुस्तक भारती में सम्मिलित किया है। तब से छत्तीसगढ़ के बच्चे  और शिक्षक इसे पढ़ते आ रहे हैं। आज यह कविता अपने फेसबुक के मित्रों के लिए खास तौर से... )


अपना प्रदेश देखो, कितना विशेष देखो,
आओ-आओ घूमो यहाँ ,खुशियों से झूमो यहाँ।
         रायपुर की क्या सानी? अपनी है राजधानी,
         ऊँचे-ऊँचे हैं मकान, यहाँ की निराली शान।।


“कोरबा” की बिजली हम सब को  मिली ।
“देवभोग” का है मान, हीरे की जहाँ खदान,
         लोहे की ढलाई देखो, देखो जी भिलाई देखो,
         गूँजे जहाँ सुर-ताल, खैरागढ़ बेमिसाल।।


“राजीव लोचन” यहाँ, रम जाए मन जहाँ,
 तीरथ में अग्रगण्य, देखो-देखो  “चम्पारण्य”
         गूँजे जहाँ सत्यनाम, “गिरौदपुरी” है धाम,
         कबिरा की सुनो बानी, “दामाखेड़ा” की जुबानी।।


महानदी धार देखो, “सिरपुर” औ “मल्हार” देखो,
“डोंगरगढ़ बमलाई देखो, “रतनपुर महमाई” देखो।।
           देवी “बेमेतरा” वाली, देखो-देखो “भद्रकाली”
      मंदिर एकमेव देखो, देखो “भोरमदेव” देखो।।

देखो ऊँचा “मैनपाट”, बड़े ही कठिन घाट,
तिब्बती मकान देखो, कितनी है शान देखो।।
“बस्तर” के वन देखो, वहाँ भोलापन देखो,
     ऊँचे-ऊँचे, झाड़ देखो, नदी और पहाड़ देखो।।


झरने हैं झर-झर,  गुफा है “कुटुमसर”,
“तीरथगढ़ प्रपात” देखो , “दंतेश्वरी मात” देखो।।
   अपना प्रदेश है ये, कितना विशेष है ये,
              सबका दुलारा है ये, सच बड़ा प्यारा है ये।।
                                                            दिनेश गौतम

Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल


बस इसलिए कि उससे कोई वास्ता नहीं है,
तू हादसे को कहता है हादसा नहीं है।

होती ही जा रही है दिल की दरार गहरी,
इस बात का तुझे क्या कोई पता नहीं है?

इंसानियत से इंसाँ, बनता है देवता भी,
इंसान जो नहीं है, वह देवता नहीं है।

लाखों में एक भी तू, ऐसा मुझे दिखा दे,
अनजान हो जो दुख से, ग़म से भरा नहीं है।

माना कि उससे मेरी कुछ दूरियाँ बढ़ी हैं,
पर दिल ये कह रहा है, वो बेवफा नहीं है।

मुझको न इतना तड़पा, नज़रें न फेर मुझसे,
माना भला नहीं पर, ये दिल बुरा नहीं है।

तेरी भी मैली चादर, मेरी भी मैली चादर,
इस दाग़ से यहाँ पर, कोई बचा नहीं है।

                                 दिनेश गौतम

Sunday, 2 September 2012

बेलूर...

(विगत दिनों अपने कर्नाटक प्रवास के दौरान मुझे ऐतिहासिक स्थल ‘बेलूर‘ के ‘चन्नकेशवा’ मंदिर जाने का अवसर लगा। होयसल सम्राट विष्णुवर्धन द्वारा निर्मित इस मंदिर में अपूर्व सुंदरी रानी शांतला (जो प्रसिद्ध नृत्यांगना थी) तथा अन्य सुंदर नर्तकियों की जीवंत प्रतिमाएं मन को मोह लेती हैं। मंदिर पर लिखी मेरी एक कविता आपके लिए प्रस्तुत है।)

वर्तमान के वक्ष पर
अतीत की धड़कन है बेलूर,
विलक्षण हो तुम
चन
्नकेशवा !

अतीत की
सुनहरी स्मृतियों के सहारे
उतर आते हो तुम
आँखों के रास्ते
मन की गहराइयों तक...

सदियों पुरानी
दीवारों पर
जड़ी हुई हैं
प्रतिमाएँ,
जैसे मार दिया हो मंतर
किसी जादूगर ने
और नृत्यांगनाएँ
बदल गई हों
प्रस्तर-प्रतिमाओं में।

अतीत की सीढि़यों पर
उतरते चले जाते हैं हम,
आँखों में उतर आती है
अपूर्व सुंदरी
रानी ‘शांतला’।

बजने लगते हैं घुंघरू,
मृदंग और वीणा,
शुरू हो जाता है
नृत्य-गान।
प्रांगण बदल जाता है
नृत्यशाला में।

हवाओं में
घुलने लगता है
सम्मोहन,
धड़कने लगते हैं
जाने कितने
विष्णुवर्धनों के हृदय।

नृत्यलीन है शांतला
नाच रही हो जैसे
स्वयं क्षणप्रभा,
कौंध रही है आँखों में
शांतला की द्युति।

देह का भूगोल
बढ़ा देता है ताप,
गोलाइयों, वक्रों
और
ढलानों से होकर
तय करने लगते हैं लोग
भूगोल से ज्यामिति तक की दूरियाँ
त्रिभंगी मुद्राएँ
सिखाती हैं
ज्यामिति के पाठ।
कई कोण बन रहे हैं
देह भंगिमाओं से।

इधर...
गुरुत्व का पाठ पढ़ाते
बिना किसी सहारे के खड़े
स्तंभ के पास खड़े हैं लोग
चकित है विज्ञान।

छूट जाता है सहसा
किसी सुंदरी के हाथ से दर्पण
उड़ जाता है
किसी शुकधारिणी के हाथों से शुक,
जब तन जाती हैं
किसी कमान की तरह
शांतला की भौंहें,
ठगे हुए से
रह जाते हैं सभी।

रूपगर्विता शांतला का
भृकुटि-विलास
ढहा देता है
जाने कितने विष्णुवर्धनों के हृदय।
गर्वान्नत भौंहें
चुनौतियाँ देती हैं
सौंदर्य के
सारे प्रतिमानों को।
शांतला की केशराशि में
उलझ कर रह जाते हैं
जाने कितने
सौण्दर्योपासक।

सुनो शांतला!
क्या पढ़े कोई
चन्नकेशवा में आकर?
भूगोल, इतिहास, विज्ञान
या सौण्दर्यशास्त्र ?
अप्रतिम हो तुम शांतला!
और
अद्भुत हो तुम
चन्नकेशवा!
सचमुच अद्भुत !!!
- दिनेश गौतम.

Saturday, 14 July 2012

क्या होगा?


क्या होगा भगवान, आखिर क्या होगा?
यहाँ सुमन के अश्रु ,शूल के चेहरे पर मुस्कान ...।
आखिर क्या होगा?

अन्यायी के आँगन, खिलती जाती रोज़ बहारें,
और न्याय की आशा में सच फिरता मारे मारे।
जीना दूभर सद्विचार का, चिंतन बुरा पनपता,
हर मुख आज त्याग लज्जा को, तम की माला जपता।
अपने हाथों स्वयं मनुजता करे गरल का पान ...।
आखिर क्या होगा?

यहाँ दीप का गला दबाएँ, मिलकर रोज अँधेरे,
अट्टहास करता कालापन, उजियारे को घेरे,
खूब जमाए रहते महफिल, पापी और लुटेरे,
दुराचार के बादल होते जाते और घनेरे।
संकट में फँसते जाते हैं, सदाचार के प्राण ...।
आखिर क्या होगा?

स्वाभिमान का मान हुआ कम, धन की बढ़ी प्रतिष्ठा,
अपने स्वारथ की खातिर बदली लोगों ने निष्ठा।
लाज बेची दिख जाती है यहाँ कहीं पर नारी,
और कहीं सिसकी भरती है, अबला की लाचारी।
बिक जाता है यहाँ टके में नारी का सम्मान ...।
आखिर क्या होगा?

रक्त माँगता देश तुम्हारा, जाग सको तो जागो,
अपनी कुंठाओं को जीतो, दुःव्यसनों को त्यागो।
अपने कंधे पर जननी का, सारा बोझ उठा लो,
मातृभूमि की चिंता कर लो, उसको ज़रा सँभालो।
मिल पाएगी क्या जननी को, वही पुरानी शान...?
आखिर क्या होगा?

Sunday, 1 July 2012

वर्षा के दोहे...


ताल-तलैया फिर भरे, नदियों में है बाढ़,
मेंढक टर्राने लगे,  फिर आया आषाढ़।

पत्ते- पत्ते धुल गए,वन की है क्या बात,
वर्षा आकर दे गई, एक नई सौगात।

बौराए बादल फिरें, नभ के नापें छोर,
धरती से आकाश तक, गर्जन का ही शोर।

इस ऋतु ने तो बदल दिया, धरती का भूगोल,,
थल बदला जल में यहाँ, नभ का रूप न बोल।

‘कजरी’, ‘झूला’, सावनी, और ‘मेघ मल्हार’,
गाने के दिन आ गए, फिर से पड़ी फुहार।

काले- काले मेघ का लगता ऐसा वेश,
जैसे गोरी फिर रही, खोले श्यामल केश।

मेघ मचाने लग गए, इस पर खूब बवाल,
‘‘रिमझिम बूँदों ने छुए, क्यूँ फूलों के गाल’’।

टूटी बिजली क्रोध में, धरती पर कल शाम,
‘‘बहुत सताया ग्रीष्म में, अब भुगतो अंजाम’’।

रंगमंच में बदल गया, आषाढ़ी आकाश,
बिजली ,बादल ,बूँद को, मिली भूमिका खास।

टपक-टपक कर झोंपड़ी, हुई रात हलकान,
महल ऊँघते ही रहे, बारिश से अनजान।

गिरें न दीवारें कहीं, ढहे न कोई मकान,
इस वर्षा में निर्धन की, रक्षा कर भगवान !
                                                         
                                       - दिनेश गौतम

Sunday, 10 June 2012

तुम्हारे बदल जाने के बाद...


तब
जब कागज़ पर
उतर नहीं सका था कुछ,
मैने हाथों में
थाम ली थी बाँसुरी
और
देर तक
घोलता रहा था
दिल का दर्द
हवाओं में।

तुम्हारे
बदल जाने का
गीत था वह।
मेरे जज़्बात
तार-तार होकर
उड़ने लगे थे फि़ज़ाओं में
और पूरे माहौल में
एक खामोश ग़मगीनी छा गई थी।
जाने कब तक
जेठ की नदिया सी
दो पतली धारें
मेरी आँखों की कोरों से निकल
उतरती रही थीं नीचे।
चाँदनी
भीगकर भारी हो चली थी,
और
रात की सफेदी में
एक कि़स्म का
बहाव था धीमा-धीमा
पर मन के भीतर
उतना ही ठहराव,
जड़वत था सब कुछ
मन के भीतर ।
न कहीं कंपन,
न कोई हलचल
पर फिर भी
इर्द गिर्द  उसके
जाने क्योँ
मंडराती रही थीं
भावनाएँ
तुम्हारे लिए
बहुत सा प्यार लेकर।
तुम्हारे बदल जाने के बाद भी।

                                          -  दिनेश गौतम

Sunday, 20 May 2012

रात...


कैसी ये मतवाली रात,
चाँद सितारों वाली रात।

कितने राज़ छुपाए बैठी,
बनकर भोली-भाली रात।

कभी लगी ये अमृत जैसी,
कभी ज़हर की प्याली रात।

बिलख रहे हैं भूखे बच्चे,
माँ की खातिर काली रात।

बँगला-गाड़ी पास है जिनके,
उनके लिए दीवाली रात।

लहू जिगर का माँगे हमसे,
बनकर एक सवाली रात।

फुटपाथों पर जब हम सोए,
लगी हमें भी गाली रात।

मत पूछो दिन कैसे बीता,
कैसे, कहाँ बिता ली रात?

दुख ने दिन को गोद ले लिया,
पीड़ाओं ने पाली रात।

दिवस बनाया पर न भरा मन,
‘उसने’ खूब बना ली रात।

                                    - दिनेश गौतम

Tuesday, 15 May 2012

भीगता रहा मन...


(आज पेश है मेरे काव्य संग्रह ‘सपनों के हंस’ से एक छंदमुक्त प्रेम कविता।)

रात
तुम्हारी कल्पना
बर्फ की तरह
पिघलती रही
सपनों की पहाडि़यों से,
निःशब्द
बहती रही
एक हिम नदी
मन के
इस छोर से उस छोर तक
और
धीमे-धीमे
भीगता रहा मन
सारी रात।
                   - दिनेश गौतम

Monday, 30 April 2012

इधर घोटाला है...


इधर घोटाला है, देखिए उधर घोटाला है,
राजनीति के दलदल में सबका मुँह काला है।

बातें हैं आदर्शों की पर करनी बिल्कुल उल्टी,
उनका यह अंदाज़ सभी का देखा- भाला है।

जो आता है फँस जाता है, स्वारथ के धागे में,
राजनीति है या कोई मकड़ी का जाला है।

पंचम सुर में झूठा गाए, बढ़चढ़कर इतराए,
सच के मुँह पर लगा हुआ अब तक इक ताला है।

गाँधी तू भी रोता होगा देश की इस हालत पर,
आखिर इसके सपनों को तूने भी पाला है।

सच कहने की सज़ा अगर दो, हँसकर मैं सह लूँगा
युग का हर सुकरात ज़हर का पीता प्याला है।
                                               - दिनेश गौतम

Thursday, 19 April 2012

इक दिया जलता रहा...



याद के शीशे  में   चेहरा,    तेरा ही ढलता रहा,
मैं कि जैसे  पाँव नंगे,     आग पर चलता रहा।

जानता था वह नहीं   आएगा फिर से लौटकर,
फिर भी झूठी आस लेकर, खुद को मैं छलता रहा।

तेरी यादों ने बनाया इक अजब सा कारवाँ,
जब खयालों का मेरे  इक काफिला चलता रहा।

यूँ तो टूटा ही किए थे    ख़्वाब मेरे फिर भला,
एक सपना तुझको लेकर , दिल में क्यूँ पलता रहा?

रोक पाया वह न मुझको, उसको है  इसका मलाल,
आँसुओं के घूँट पीकर     हाथ बस मलता रहा।

मानता हूँ तेरे बँगले      में  ग़ज़ब थी रौशनी,
पर मेरे आँगन में भी तो,   इक दिया जलता रहा।
                                               - दिनेश गौतम

Wednesday, 11 April 2012

ग़ज़ल - देवता नहीं है...


बस इसलिए कि तेरा कोई वास्ता नहीं है,
तू हादसे को कहता है, हादसा नहीं है।

होती ही जा रही है, दिल की दरार गहरी,
इस बात का तुझे क्या, कोई पता नहीं है?

इंसानियत से इन्सां, बनता है देवता भी,
इंसान जो नहीं है, वह देवता नहीं है।

लाखों में एक भी तू, ऐसा मुझे बता दे,
अनजान हो जो दुख से, ग़म से भरा नहीं है।

माना कि उससे मेरी, कुछ दूरियाँ बढ़ी हैं,
पर दिल ये कह रहा है, वो बेवफा नहीं है।

मुझको न इतना तड़पा, नज़रें न फेर मुझसे,
माना भला नहीं पर, ये दिल बुरा नहीं है।

तेरी भी मैली चादर, मेरी भी मैली चादर,
इस दाग़ से यहाँ पर, कोई बचा नहीं है।
                                                    - दिनेश गौतम.