Total Pageviews

Monday, 27 February 2012

वह मसीहा हो गया...

आँधियों के बीच फँसकर वह कहीं पर खो गया,
कुछ नहीं जब बन सका तो वह मसीहा हो गया।

हम समझते थे मुसीबत में बचा लेगा हमें,
चीखते ही हम रहे वह ओढ़कर मुँह सो गया।

देखने में था भला वह, इक फरिश्ते की तरह,
पर अँधेरा फैलते ही एक शैताँ हो गया।

लौटकर आया नहीं वो लाख कोशिश की मग़र,
दिल की नगरी छोड़कर, दिल से निकलकर जो गया।

रेत के थे कुछ घरौंदे ख्वाब मेरे क्या कहूँ,
वक्त का बेदिल समंदर आज जिनको धो गया।

दर्द इतने हो गए हैं, औ ज़रा सी जि़ंदगी,
जिसने भी किस्सा सुना बस चार आँसू रो गया।

- दिनेश गौतम

3 comments:

Sanjay Mahapatra said...

देखने में था भला वह, इक फरिश्ते की तरह,
पर अँधेरा फैलते ही एक शैताँ हो गया।

बेहतरीन,गंभीर और सार्थक ,, बधाई आपको

dinesh gautam said...

धन्यवाद।

mahendra verma said...

दर्द इतने हो गए हैं, औ ज़रा सी जि़ंदगी,
जिसने भी किस्सा सुना बस चार आँसू रो गया।

बहुतों के मन के करीब से गुजर जाने वाली बेहतरीन ग़ज़ल।