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Monday, 20 April 2020

तुम्हारा नाम

सुनो !
मेरी साँसों में
घुल गया है
नाम तुम्हारा,
मेरी धड़कनों में
चस्पा हैं
तुम्हारे नाम के
एक-एक अक्षर।
हृदय में गूँज रही है
अब भी
तुम्हारी नाम धुन
निरंतर,
अविरल,
अबाध।
हर धड़कन के साथ
और भी स्पष्ट निकलती है
तुम्हारे नाम की ध्वनि

स्मृतियों के जल महल में
रह-रह कर चमकती हैं
तुम्हारी छवियाँ।

तुम्हारा प्रेम
कभी संदेह था
साथ मेरे,
साकार थीं तुम
मेरे साथ
प्रेम के भीतर।
अब
 देह नहीं है तुम्हारी।
मेरे साथ,
देह तो निकलकर चली गई
कहीं और।

मेरे पास बच गया है
केवल प्रेम।
सात्विक,
निर्गुण,
निराकार।
पहले से कहीं उजला,
पहले से कहीं अधिक निर्मल
और बहुत पावन।

सुनो !
यह निराकार बोलता है
मेरे भीतर
सातों सुर में
बोलते हैं अब भी
तुम्हारे नाम के
ढाई अक्षर
मेरी हर धड़कन में।
  दिनेश गौतम

Sunday, 15 March 2020

सूख गया प्रेम वृक्ष

दो हज़ार पंद्रह से मेरा ब्लॉग तकनीकी कारणों से बंद पड़ा था। आज मेरे बेटे प्रणय ने आख़िर वह समस्या हल कर दी और यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि मैंने फिर से उसमें अपनी कविताएँ पोस्ट करना प्रारंभ कर दिया है। शुरुआत एक गीत से - आप सबकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।



सूख गया प्रेम वृक्ष, पत्र सब झरे
सींच रहे ठूँठ को, नयन जल भरे...

जाने क्यों दीपों के भाग लिखे अंधड़ ही
और नए उपवन की, किस्मत में पतझड़ ही
मधुमासी स्वप्न सभी, रह गए धरे.......

लुटी हुई पूँजी है, भोले विश्वासों की
जीवन अब शेष कथा श्वासों -निश्वासों की
कौन यहाँ अमृत की, कामना करे....

नीरवता पसरी है मीलों तक अंतर में,
खिले हुए नागफनी प्राणों के बंजर में
गीतों के निर्झर भी सूख सब मरे.....

नदी के किनारों से, बिगड़े संबंध यहाँ
लहरों की सुने कौन, बहरे तटबंध यहाँ
पत्थर की नौकाएँ, कौन फिर वरे..
              -  दिनेश गौतम

Sunday, 22 February 2015

यादें मरती नहीं हैं----

यादें मरती नहीं हैं

तुम्हारी यादों के साथ- साथ
चलता है झील का किनारा,
जहाँ किनारे खड़े
पेड़ों के साए में
चले थे हम-तुम
साथ-साथ,
झील के दूसरे छोर तक।

तुम्हें याद है या नहीं
तुम्हीं ने आगे बढ़कर
मेरे हाथों में अपना हाथ
डाल दिया था
और कहा था- ‘‘ ये पक्का है,
और इस जनम में तो
छूटने से रहा।’’

बस उसी पल से
हवा में फैल गई थी
तुम्हारे प्यार की खुशबू
और महकाती रही
मेरे मन-प्राणों को
तब से अब तक
और मैंने भी तुम्हें
अपनी रुह में टाँक लिया था।

हैरत में हूँ  मैं
कि झटक दिया है तुमने
अब वही हाथ,
जबकि इसी जनम के
सात बरस भी पूरे नहीं हो पाए।
सतरंगी सपनों का ‘स्पेक्ट्रम’
घुमा दिया  तुमने,
और सब कुछ अचानक
सफेद हो गया।

कोई रंग नहीं जीवन में अब
इस सफेद रंग के सिवा।
हवाओं की खुशबू
कहीं खो गई।
खींच दी तुमने लकीर
अचानक
मेरे और अपने बीच,
और कह दिया-
‘‘इस पार आने से
तुम पत्थर के हो जाओगे।’’
मुझे लगता है कि
तुम ही बदल गईं
किसी पत्थर में
किसी तिलस्म ने
छीन ली मेरी राजकुमारी।

मेरी नींदें
भटकती हैं आँखों से दूर,
यहाँ अब रतजगे रहते हैं
पूछते हैं जो मुझसे-
‘‘क्या हुआ
हाथों में दिए गए हाथ का?
क्या यह जन्म ख़त्म हो चुका है?’’

‘दलपत सागर’ -वह झील,
क्यूँ बदल गई है
पोखर में?
सूख रही है झील,
मर रहा है पानी,
पर
यादें हैं कि मरती नहीं हैं।
             
                     -  दिनेश गौतम


 27. 01.2015                 फतेहसागर झील, उदयपुर।


Monday, 9 September 2013

उनकी क्या है बात

उनकी क्या है बात, वे स्वर्णिम शिखर बनकर रहेंगे,
हम तो हैं बेबस बेचारे, नींव के पत्थर रहेंगे।

उनकी आँखें की चमक हीरों से बढ़ती जाएगी,
और अपने ये नयन तो, अश्रुओं से तर रहेंगे।

तितलियों से बोल दो, इस बाग में न यूँ फिरें,
एक दिन वरना उन्हीं के, कुछ नुचे से पर रहेंगे।

लाख रोकें हम शलभ को दीप की लौ पर न जा,
प्यार पागलपन है ऐसा, वे तो बस जलकर रहेंगे।

नफरतों की वो इमारत अब ढहा दी जाएगी,
इस नगर में तो हमारे, प्यार के ही घर रहेंगे।

देखना तुम जुल्म के आगे झुकी सब गर्दनें,
एक मेरा, इक तुम्हारा दो ही ऊँचे सर रहेंगे।

ये अजब है बात, जिनको चाहिए न हों वहाँ,
वे ही लेकिन उस जगह पर, देखना अक्सर रहेंगे।

खो चुके हैं जो चमक, वे दिख रहे बाज़ार में,
पर असल में हैं जो मोती, सीप के अंदर रहेंगे।
- दिनेश गौतम

Wednesday, 14 November 2012

दीप जलाना होगा...



घना अंधेरा है अब कोई दीप जलाना होगा,
दूर सवेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।

कलह - क्लेश की ज्वाला जलती, दिखती है घर-घर में,
जाग रही शैतानी ताकत लोगों के अंतर में।
तम ने घेरा है अब कोई दीप जलाना होगा...

अंतःद्वंद्वों के बीहड़ में भटक रहा हर मन है,
एक व्यक्ति के कई रूप हैं, दुहरा हर जीवन है।
अजब ये फेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।....

खंडित एक पत्थर रक्खा है, मंदिर के कोने में,
संशय सा होता है अब तो ईश्वर के होने में।
संदेह घनेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।...

अपने कंधे पर हों जैसे अपना ही शव लादे,
लुटे - लुटे से घूम रहे हम पीड़ा के शहजा़दे।
ये वक्त लुटेरा है अब कोइ दीप जलाना होगा।...

सपनों की उजड़ी बस्ती में भटकें हम दीवाने,
ढही हुई है दरो-दीवारें सभी तरफ वीराने।
उजड़ा ये डेरा है अब कोई दीप जलाना होगा।...

                                                                   - दिनेश गौतम


Thursday, 1 November 2012

छत्तीसगढ़-दर्शन


(आज छत्तीसगढ़ का स्थापना दिवस है।  हरे भरे और हर दृष्टि से संपन्न इस राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं। इसके विभिन्न महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों को लेकर मैंने एक कविता लिखी थी “छत्तीसगढ़ दर्शन” इस कविता को राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने अपनी पत्रिका बालमित्र में पहली बार अक्टूबर 2007 के अंक में प्रकाशित कर 2008 से कक्षा 8वीं की हिंदी भाषा की पाठ्यपुस्तक भारती में सम्मिलित किया है। तब से छत्तीसगढ़ के बच्चे  और शिक्षक इसे पढ़ते आ रहे हैं। आज यह कविता अपने फेसबुक के मित्रों के लिए खास तौर से... )


अपना प्रदेश देखो, कितना विशेष देखो,
आओ-आओ घूमो यहाँ ,खुशियों से झूमो यहाँ।
         रायपुर की क्या सानी? अपनी है राजधानी,
         ऊँचे-ऊँचे हैं मकान, यहाँ की निराली शान।।


“कोरबा” की बिजली हम सब को  मिली ।
“देवभोग” का है मान, हीरे की जहाँ खदान,
         लोहे की ढलाई देखो, देखो जी भिलाई देखो,
         गूँजे जहाँ सुर-ताल, खैरागढ़ बेमिसाल।।


“राजीव लोचन” यहाँ, रम जाए मन जहाँ,
 तीरथ में अग्रगण्य, देखो-देखो  “चम्पारण्य”
         गूँजे जहाँ सत्यनाम, “गिरौदपुरी” है धाम,
         कबिरा की सुनो बानी, “दामाखेड़ा” की जुबानी।।


महानदी धार देखो, “सिरपुर” औ “मल्हार” देखो,
“डोंगरगढ़ बमलाई देखो, “रतनपुर महमाई” देखो।।
           देवी “बेमेतरा” वाली, देखो-देखो “भद्रकाली”
      मंदिर एकमेव देखो, देखो “भोरमदेव” देखो।।

देखो ऊँचा “मैनपाट”, बड़े ही कठिन घाट,
तिब्बती मकान देखो, कितनी है शान देखो।।
“बस्तर” के वन देखो, वहाँ भोलापन देखो,
     ऊँचे-ऊँचे, झाड़ देखो, नदी और पहाड़ देखो।।


झरने हैं झर-झर,  गुफा है “कुटुमसर”,
“तीरथगढ़ प्रपात” देखो , “दंतेश्वरी मात” देखो।।
   अपना प्रदेश है ये, कितना विशेष है ये,
              सबका दुलारा है ये, सच बड़ा प्यारा है ये।।
                                                            दिनेश गौतम

Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल


बस इसलिए कि उससे कोई वास्ता नहीं है,
तू हादसे को कहता है हादसा नहीं है।

होती ही जा रही है दिल की दरार गहरी,
इस बात का तुझे क्या कोई पता नहीं है?

इंसानियत से इंसाँ, बनता है देवता भी,
इंसान जो नहीं है, वह देवता नहीं है।

लाखों में एक भी तू, ऐसा मुझे दिखा दे,
अनजान हो जो दुख से, ग़म से भरा नहीं है।

माना कि उससे मेरी कुछ दूरियाँ बढ़ी हैं,
पर दिल ये कह रहा है, वो बेवफा नहीं है।

मुझको न इतना तड़पा, नज़रें न फेर मुझसे,
माना भला नहीं पर, ये दिल बुरा नहीं है।

तेरी भी मैली चादर, मेरी भी मैली चादर,
इस दाग़ से यहाँ पर, कोई बचा नहीं है।

                                 दिनेश गौतम