लौट आया फिर से लो मदमाता फागुन,
भौंरों की गुनगुन में कुछ गाता फागुन।
फूलों से लदी हुई शाख मुस्कुराती है,
हवा के झकोरों से झूम-झूम जाती है।
कलियों की पंखुरियाँ हौले से खुलती हैं,
शबनम की कुछ बूँदें पत्तों पर ढुलती हैं।
बूँदों में शबनम की, कुछ गाता फागुन ...।
नदिया की कल-कल में, एक नया गीत है,
झरनों के झर-झर में कोई संगीत है।
इक मीठी तान छेड़ कोयल भी गाती है,
मौसम के गीतों को गाकर सुनाती है,
वन में यूँ सुर-मेले सजवाता फागुन...।
झूमते पलाशों पर मस्ती सी छाई है,
उनके खुश होने की जैसे रुत आई है।
टेसू की टहनी पर आग इक मचलती है,
लगता है फुनगी हर धू-धू कर जलती है।
फूलों में अंगारे भर जाता फागुन...।
काँधे पर खुशबू को लिए हवा बहती है,
रस भीगी बातें वह कानों में कहती है।
तन-मन पर इक खुमार हावी हो जाता है,
मीठी सी एक कसक मन में बो जाता है।
मन के हर कोने को महकाता फागुन ...।
अलसायी गोरी का यौवन मतवाला है,
भरी हुई नस-नस में ज्यों कोई हाला है।
कचनारी देह कोई जादू जगाती है,
नयनों को आमंत्रण बाँट-बाँट जाती है।
गोरी के यौवन में इतराता फागुन...।
- दिनेश गौतम
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Monday, 30 January 2012
Saturday, 21 January 2012
ग़ज़ल...
दर्द के हाथों खुशी को बेच मत,
अपने होठों की हँसी को बेच मत।
क्या लगाएगा भला कीमत कोई,
मान- मर्यादा, खुदी को बेच मत।
बस नुमाइश के लिए बाज़ार में,
अपने तन की सादगी को बेच मत।
मौत की राहें न चुन अपने लिए,
प्यार की इस जिंदगी को बेच मत।
बस अँधेरा ही अँधेरा पाएगा,
इस तरह तू रौशनी को बेच मत।
बेमुरव्वत इस ज़माने के लिए,
अपनी आँखों की नमी को बेच मत।
आलिमों में नाम होगा एक दिन,
इल्म की इस तिश्नगी को बेच मत।
- दिनेश गौतम
अपने होठों की हँसी को बेच मत।
क्या लगाएगा भला कीमत कोई,
मान- मर्यादा, खुदी को बेच मत।
बस नुमाइश के लिए बाज़ार में,
अपने तन की सादगी को बेच मत।
मौत की राहें न चुन अपने लिए,
प्यार की इस जिंदगी को बेच मत।
बस अँधेरा ही अँधेरा पाएगा,
इस तरह तू रौशनी को बेच मत।
बेमुरव्वत इस ज़माने के लिए,
अपनी आँखों की नमी को बेच मत।
आलिमों में नाम होगा एक दिन,
इल्म की इस तिश्नगी को बेच मत।
- दिनेश गौतम
Friday, 30 December 2011
फिर से सावन आएगा...
ग़र जड़ों में हो नमी तो, फिर हरापन आएगा
तुम घटा की चाह रक्खो, फिर से सावन आएगा।
रेत है पैरों के नीचे, दूर तक मंजि़ल नहीं,
पर अगर चलते रहे तो एक उपवन आएगा।
झर चुके हैं पत्र सारे, डाल हर वीरान है,
पेड़ को पर आस है ये , फिर से यौवन आएगा।
होटलों की चाकरी औ बूट-पाॅलिश के लिए
आप कोई नाम ढूँढें, एक बचपन आएगा।
देह का घटिया प्रदर्शन, बेहयाई, नग्नता,
क्या कभी सोचा था हमने, ये खुलापन आएगा?
राजनीति के भँवर में फँस गए हैं हम यहाँ,
जो उबारेगा हमें फिर, क्या वो शासन आएगा?
कंस कितने हो गए , दुश्शासनों की क्या कमी,
पर न जाने पीर हरने, कब वो मोहन आएगा?
- दिनेश गौतम
तुम घटा की चाह रक्खो, फिर से सावन आएगा।
रेत है पैरों के नीचे, दूर तक मंजि़ल नहीं,
पर अगर चलते रहे तो एक उपवन आएगा।
झर चुके हैं पत्र सारे, डाल हर वीरान है,
पेड़ को पर आस है ये , फिर से यौवन आएगा।
होटलों की चाकरी औ बूट-पाॅलिश के लिए
आप कोई नाम ढूँढें, एक बचपन आएगा।
देह का घटिया प्रदर्शन, बेहयाई, नग्नता,
क्या कभी सोचा था हमने, ये खुलापन आएगा?
राजनीति के भँवर में फँस गए हैं हम यहाँ,
जो उबारेगा हमें फिर, क्या वो शासन आएगा?
कंस कितने हो गए , दुश्शासनों की क्या कमी,
पर न जाने पीर हरने, कब वो मोहन आएगा?
- दिनेश गौतम
Sunday, 18 December 2011
तुम भरमाए से लगते हो...।
मेरी उंगली नुची हुई पर तार छेड़ता हूँ वीणा के
तुमने बस पीड़ा को देखा औ’ बौराए से लगते हो..।
पीड़ाओं के हर अरण्य में, मैं फिरता हूँ निपट अकेला
दुख की परिभाषा तक पहुँचे,तुम घबराए से लगते हो..।
जन्म-जन्म से पदाक्रांत मैं, मैंने उठना अभी न छोड़ा
ठोकर एक लगी जो तुमको, बस गिर आए से लगते हो..।
जीवन भर मैं रहा बाँटता, उजियारा तम को पी-पी कर,
एक अँधेरी निशा मिली तो, तुम सँवलाए से लगते हो..।
प्रखर भानु की अग्नि- रश्मियाँ मैंने झेलीं खुली देह पर
थोड़ी ऊष्मा तुम्हें छू गई, तो कुम्हलाए से लगते हो..।
दुविधाओं के प्रश्न अनुत्तर, कितने हल कर डाले मैंने,
पथ चुनने की इस बेला में, तुम भरमाए से लगते हो..।
- दिनेश गौतम
तुमने बस पीड़ा को देखा औ’ बौराए से लगते हो..।
पीड़ाओं के हर अरण्य में, मैं फिरता हूँ निपट अकेला
दुख की परिभाषा तक पहुँचे,तुम घबराए से लगते हो..।
जन्म-जन्म से पदाक्रांत मैं, मैंने उठना अभी न छोड़ा
ठोकर एक लगी जो तुमको, बस गिर आए से लगते हो..।
जीवन भर मैं रहा बाँटता, उजियारा तम को पी-पी कर,
एक अँधेरी निशा मिली तो, तुम सँवलाए से लगते हो..।
प्रखर भानु की अग्नि- रश्मियाँ मैंने झेलीं खुली देह पर
थोड़ी ऊष्मा तुम्हें छू गई, तो कुम्हलाए से लगते हो..।
दुविधाओं के प्रश्न अनुत्तर, कितने हल कर डाले मैंने,
पथ चुनने की इस बेला में, तुम भरमाए से लगते हो..।
- दिनेश गौतम
तुम भरमाए से लगते हो...।
मेरी उंगली नुची हुई पर तार छेड़ता हूँ वीणा के
तुमने बस पीड़ा को देखा औ’ बौराए से लगते हो..।
पीड़ाओं के हर अरण्य में, मैं फिरता हूँ निपट अकेला
दुख की परिभाषा तक पहुँचे,तुम घबराए से लगते हो..।
जन्म-जन्म से पदाक्रांत मैं, मैंने उठना अभी न छोड़ा
ठोकर एक लगी जो तुमको, बस गिर आए से लगते हो..।
जीवन भर मैं रहा बाँटता, उजियारा तम को पी-पी कर,
एक अँधेरी निशा मिली तो, तुम सँवलाए से लगते हो..।
प्रखर भानु की अग्नि- रश्मियाँ मैंने झेलीं खुली देह पर
थोड़ी ऊष्मा तुम्हें छू गई, तो कुम्हलाए से लगते हो..।
दुविधाओं के प्रश्न अनुत्तर, कितने हल कर डाले मैंने,
पथ चुनने की इस बेला में, तुम भरमाए से लगते हो..।
- दिनेश गौतम
तुमने बस पीड़ा को देखा औ’ बौराए से लगते हो..।
पीड़ाओं के हर अरण्य में, मैं फिरता हूँ निपट अकेला
दुख की परिभाषा तक पहुँचे,तुम घबराए से लगते हो..।
जन्म-जन्म से पदाक्रांत मैं, मैंने उठना अभी न छोड़ा
ठोकर एक लगी जो तुमको, बस गिर आए से लगते हो..।
जीवन भर मैं रहा बाँटता, उजियारा तम को पी-पी कर,
एक अँधेरी निशा मिली तो, तुम सँवलाए से लगते हो..।
प्रखर भानु की अग्नि- रश्मियाँ मैंने झेलीं खुली देह पर
थोड़ी ऊष्मा तुम्हें छू गई, तो कुम्हलाए से लगते हो..।
दुविधाओं के प्रश्न अनुत्तर, कितने हल कर डाले मैंने,
पथ चुनने की इस बेला में, तुम भरमाए से लगते हो..।
- दिनेश गौतम
मेरी उंगली नुची हुई पर तार छेड़ता हूँ वीणा के
तुमने बस पीड़ा को देखा औ‘ बौराए से लगते हो..।
पीड़ाओं के हर अरण्य में, मैं फिरता हूँ निपट अकेला
दुख की परिभाषा तक पहुँचे,तुम घबराए से लगते हो..।
जन्म-जन्म से पदाक्रांत मैं, मैंने उठना अभी न छोड़ा
ठोकर एक लगी जो तुमको, बस गिर आए से लगते हो..।
जीवन भर मैं रहा बाँटता, उजियारा तम को पी-पी कर,
एक अँधेरी निशा मिली तो, तुम सँवलाए से लगते हो..।
प्रखर भानु की अग्नि- रश्मियाँ मैंने झेलीं खुली देह पर
थोड़ी ऊष्मा तुम्हें छू गई, तो कुम्हलाए से लगते हो..।
दुविधाओं के प्रश्न अनुत्तर, कितने हल कर डाले मैंने,
पथ चुनने की इस बेला में, तुम भरमाए से लगते हो..।
- दिनेश गौतम
Sunday, 11 December 2011
कैसी लाचारी...
मर-मर कर जीने की कैसी लाचारी ?,
छोटे से इस दिल को मिले दर्द भारी...।
धुँधले से दिन हैं अब
काली है रातें ,
अंगारे दे गई हैं
अब की बरसातें,
आँगन में गाजों का,गिरना है जारी...।
मन की इस बगिया में
झरे हुए फूल हैं,
कलियों से बिंधे हुए
निष्ठुर से शूल हैं,
मुरझाई लगती है,सपनों की क्यारी...।
नई-नई पोथी के
पृ्ष्ठ कई जर्जर हैं,
तार-तार सप्तक हैं,
थके-थके से स्वर हैं,
बस गई हैं तानों में,पीड़ाएँ सारी...।
दूर तक मरुस्थल की
फैली वीरानी है,
मन के मृगछौने के
सपनों में पानी है।
भटक रही हिरनी भी, तृष्णा की मारी...।
रतिया की सिसकी है,
दिवस की व्यथाएँ हैं,
ठगे हुए सपनों की
अनगिन कथाएँ हैं।
दुनिया में जीने की, इतनी तैयारी...।
- दिनेश गौतम
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